इस बड़ी सी दुनिया के भू-भाग के किसी कोने में एक चार दीवारी के भीतर, मैं अपने मन में रहती हूँ। मन में मेरे जो सागर हैं, उसकी लहरें हैं असीमित , ये लहरें जल की नहीं, ये है अनकहे शब्दों और विचारों की, या यूँ कहूँ, है ये दर्पण उस वाणी की, जिसे मैं ना कभी बोल सकी.... आश्चर्य नहीं, की इस बड़ी सी दुनिया के एक छोटे से कोने में मैं अपने मन में रहती हूँ, नहीं दे पाती शब्द अपने विचारों को क्योंकि, जब मन की गहराई तक जाती हूँ तो दुनिया छोटी लगती। असीमित इस में, मैं जीवन महसूश करती हूँ, अकेली रहती हूँ यहाँ, पर अकेलापन महसूश नहीं करती। कभी रात के अँधेरे में, जब सारी दुनिया सो जाती है, मैं सबकी नजरों से दूर, इस सागर में खो जाती हूँ। कुछ मन की सुनती हूँ, कुछ उसे सुनाती हूँ, और कभी जो लहरों में उफान बढ़ जाए तो आँखों से कुछ बूंदों को बहाकर हल्का हो लेती हूँ थोड़ी और जगह, कुछ और ही विचारों को समेटने के लिए... सब कहते हैं कि बहुत चुप सी रहती हूँ, हाँ! मैं अपने मन के भीतर शब्दों से एक असीम सागर का निर्माण करती हूँ। इस सागर की गहराई में, मैं खुद से मिलती हूँ दुनिया के लिए हूँ शांत पर यहाँ मैं, जो भरकर बोलती ...
मेरे लिए आसान नहीं किसी के पास आना, हमेशा ही डर लगता है उनसे दूर जाना। थोड़ा अजीब हूँ, अपने ख़यालों में खोया हूँ, कभी अकेले में चुपके से रोया हूँ। क्या आप मेरे आँसुओं को समझ पाओगे? कुछ गलत हो या सही, कह नहीं पाता, एक छोटा सा भी झूठ सह नहीं पाता। क्या आप मेरे पूछे बिना सारे सवालों का जवाब दे पाओगे? मैं बिना शिकायत किए दूर होने लगता हूँ, अपने ही दर्द से मजबूर होने लगता हूँ। क्या आप मुझे दूर होने से रोक पाओगे? थोड़ी सी भी दूरी महसूस होते ही सोचने लगता हूँ, खुद को पास जाने से रोकने लगता हूँ। क्या आप मेरी मन की सभी लहरों को शांत कर पाओगे? कभी दिल चाहता है सब कुछ बता दूँ, कभी खामोशी में खुद को छुपा लूँ। क्या आप मेरी खामोशी भी पढ़ पाओगे? मैं अक्सर मुस्कुरा कर दर्द छुपा लेता हूँ, भीड़ में रहकर भी खुद को तन्हा कर लेता हूँ। क्या आप उस तन्हाई को मिटा पाओगे? रिश्तों से डरता हूँ, फिर भी चाहत रखता हूँ, टूट जाने के बाद भी हिम्मत करता हूँ। क्या आप मेरा ये भरोसा निभा पाओगे? मैं पूरा नहीं हूँ, कुछ अधूरा सा, कुछ टूटा सा हूँ, हर खुशी में भी थोड़ा सा खोया सा हूँ। क्या आप ...